ललित विसाखा सखी पियारी। दंपति सुख मन समुझनि हारी॥८८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
नवल किशोरी प्रिया की प्राण-प्रिय सहचरियाँ श्री ललिता-विशाखा ही दम्पति के आभ्यन्तर सुखों को समझने में समर्थ हैं