॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 23.91

रहस्य-मञ्जरी

या सुख पर नाहिंन सुख औरै। जेहि उर रचे रसिक सिरमौरै॥९१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री धरुवदास जी कहते हैं उपरिवर्णित रहस्य मंजरी के सुखों से अघिक अन्य कोई सुख नहीं है, किन्तु जिस किसी सौभाग्यशाली हृदय में रसिक शिरोमणि श्री हित-हरिवंश चन्द्र कृपा पूर्वक इसकी स्थापना कर दें । वही इस सुख का अधिकारी हो सकेगा