या सुख पर नाहिंन सुख औरै। जेहि उर रचे रसिक सिरमौरै॥९१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री धरुवदास जी कहते हैं उपरिवर्णित रहस्य मंजरी के सुखों से अघिक अन्य कोई सुख नहीं है, किन्तु जिस किसी सौभाग्यशाली हृदय में रसिक शिरोमणि श्री हित-हरिवंश चन्द्र कृपा पूर्वक इसकी स्थापना कर दें । वही इस सुख का अधिकारी हो सकेगा