गौर स्याम तन मन रँगे, प्रेम स्वाद रस सार।
निकसत नहिं तिहिं ऐंन तें, अटके सरस विहार॥२९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
रससार प्रेम के आस्वादन में तन-मन रँगे और सरस विहार में ही अटके गौर-श्याम युगल श्री वृन्दावन धाम से कभी बाहर निकलते ही नहीं हैं