सिथल अंग बलहीन सखि, कछुक भयौ तन छीन।
करि उपाइ प्यारी प्रिया, तुम जल हौ वे मीन॥३॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
हे सखि ! प्रियतम के सभी अङ्ग प्रेम-प्रभाव से शिथिल तथा बलहीन हो चुके हैं। उनका सुभग तनु कुछ-कुछ कृश भी हो गया है। हे प्राण-प्रिये !। आप शीतल जल की भाँति हैं तथा वह आपके स्वरूप में निवास करने वाले मीन की भाँति हैं। उनका जीवन आपके अघीन है, अतएव जीवन-रक्षा का कोई उपाय कीजिये