प्रथमहिं नारी देखिकैं, हिय पर कर धर्यौ आनि।
रौंम-रौंम आनँद भयौ, परस होत ही पानि॥८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री प्रिया ने प्रियतम के कर-कमल को अपने कर-कमलों में धारण करके कराङ्गुलियों का सुखद स्पर्श प्रदान करते हुए सर्वप्रथम उनका नाड़ी-परीक्षण किया । तदुपरान्त उनके वक्षस्थल पर अपना सुशीतल कर-कमल स्थापित करके मानो हृदय-गति एवं स्थिति का भी परीक्षण किया । परीक्षण के व्याज से वस्तुतः अमृतमय स्पर्श दिया । फलतः प्राण-प्रिया का रसद स्पर्श प्राप्त करके प्रियतम का रोम-रोम आनन्दातिरेक से भर गया