होम › श्री हित बयालीस लीलाश्री हित बयालीस लीला — छंद 25.3रति-मञ्जरी एती मति मोपै कहाँ, सिंधु न सीप समात।रसिक अनन्यनि कृपा बल, जो कछु बरन्यौ जात॥३॥