॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 25.3

रति-मञ्जरी

एती मति मोपै कहाँ, सिंधु न सीप समात।
रसिक अनन्यनि कृपा बल, जो कछु बरन्यौ जात॥३॥