कानन में रहे झलकि कै, आनन विवि विधु काँति।
सहज चकोरी सखिनि की, अखियाँ निरखि सिराँति॥३२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री वृन्दावन में युगल किशोर की मुख-चन्द्र-कान्ति सदैव झलकती रहती है, जिसे निरख कर चकोरी सखियों के नेत्र शीतल होते रहते हैं