॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 4.32

श्री वृन्दावन शत

कानन में रहे झलकि कै, आनन विवि विधु काँति।
सहज चकोरी सखिनि की, अखियाँ निरखि सिराँति॥३२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री वृन्दावन में युगल किशोर की मुख-चन्द्र-कान्ति सदैव झलकती रहती है, जिसे निरख कर चकोरी सखियों के नेत्र शीतल होते रहते हैं