॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

श्री हित बयालीस लीला — छंद 25.24

रति-मञ्जरी

जेहि अँग ओर परै मन जाई। छुटै न तहाँ ते रहत लुभाई॥२४॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री प्रिया के जिस अङ्ग पर प्रियतम का मन जा पड़ता है, वहीं लुब्ध होकर रह जाता है, वहाँ से छूट नहीं पाता