॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 25.36

रति-मञ्जरी

प्रबल चौंप बाढ़ी दुहुँ माहीं। रस समतूल कोऊ घटि नाहीं॥३६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

जब नव-बाला ने प्रियतम को अपने अधर-रस से सिञ्चित्‌ किया, तब प्रियतम का मन ऐसे प्रफुल्लित हो उठा, मानो तमाल-तरु मदन रस से सिञ्चित्‌ हुआ हो॥३४ ।] तदुपरान्त सुकुमार युगल-केलि के रस में भींज गये । क्षण-क्षण प्रति उनके हृदयों में नव-नव भावों की सृष्टि होने लगी॥३५ । दोहा रति-केलि-विस्तार चौपाई दोनों में प्रेम संग्राम की प्रबल उत्कण्ठा बढ़ चली, क्योंकि दोनों ही रस समतुल्य नवल नायक-नायिका हैं