दुहुँ मन रुचि एकै ह्वै जबहीं। सुख की बेलि बढ़ै ‘ध्रुव’ तबहीं॥५०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जब रसिक युगल की रुचियाँ अद्वैत से हट कर द्वैत में स्थित होती हैं, तब परम सुख की लता लहलहा उठती है