प्यावति प्यारी प्यार सौं, प्रेम रसासव सार।
त्यौं-त्यौं प्यारे लाल के, बाढ़त त्रिषा अपार॥५९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
दोहा चौपाई वे अत्यन्त प्रीति-पूर्वक प्रेम रसासव-सार अपना अधरामृत पान कराने लगती हैं । अधरामृत पान के साथ साथ रस-लोलुप प्रियतम के हृदयमें प्रेम की अपार तृषा प्रतिक्षण बढ़ती ही चली जाती है