॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 25.59

रति-मञ्जरी

प्यावति प्यारी प्यार सौं, प्रेम रसासव सार।
त्यौं-त्यौं प्यारे लाल के, बाढ़त त्रिषा अपार॥५९॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

दोहा चौपाई वे अत्यन्त प्रीति-पूर्वक प्रेम रसासव-सार अपना अधरामृत पान कराने लगती हैं । अधरामृत पान के साथ साथ रस-लोलुप प्रियतम के हृदयमें प्रेम की अपार तृषा प्रतिक्षण बढ़ती ही चली जाती है