सबै सखी सब सौंज लै, रँगी जुगल ध्रुव रंग।
समै समै की जानि रुचि, लियै रहति हैं संग॥३९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री धरुवदास जी कहते हैं कि युगल प्रीति में रँगी हुई सखियाँ समय-समय की रुचि के अनुसार सब सेवा-सामग्री लिये निरन्तर युगल की सेवा में साथ बनी रहती हैं