॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 4.39

श्री वृन्दावन शत

सबै सखी सब सौंज लै, रँगी जुगल ध्रुव रंग।
समै समै की जानि रुचि, लियै रहति हैं संग॥३९॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री धरुवदास जी कहते हैं कि युगल प्रीति में रँगी हुई सखियाँ समय-समय की रुचि के अनुसार सब सेवा-सामग्री लिये निरन्तर युगल की सेवा में साथ बनी रहती हैं