मैंड़ तोरि रस चल्यौ अपारा। रही न तन-मन कछू सँभारा॥७४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
रस-विलास की परिव्याप्ति में रसिक युगल अपने तन-मन एवं आत्मानुसन्धान से रहित हो जाते हैं। तब रस का प्रवाह समस्त मर्यादाओं का उल्लङ्घन करके अपनी पूर्णावस्था को प्राप्त हुआ प्रवाहित हो चलता है