या रस सौं लाग्यौ रहै, निसि दिन जाकौ चित्त।
ताकी पद-रज सीस धरि, बंदत रहौ 'ध्रुव' नित्त॥८२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
हे रसिक बन्धुओ ! ध्यान रहे रति मझरी' वर्णित यह रस जिसे न सुहावे, तुम्हें चाहिए कि उस व्यक्ति का सामीप्य-सहवास (संग-साथ) शीघ्र छोड़ दोहा पुनः अन्तिम अभिलाषा करते हुए श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जिस किसी भाग्यशाली का चित्त इस रस में निरन्तर रँगा रहता है, उसके श्री चरणों की धूलि शिरोधार्य करके सदैव उसकी वन्दना करते रहना चाहिए