कुँवर प्रेम कौ सागर राजै। प्रिया-प्रेम तहँ भँवर बिराजै॥५०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री लाल जी का स्वरूप चौपाई सोरठा श्री लाल जी की प्रीति-रीति चौपाई रसिक कुँवर प्रियतम प्रेम के अपार समुद्र हैं, किन्तु उस प्रेम-समुद्र में पड़ने वाली भँवर का स्वरुप है-श्री प्रिया का प्रेम