॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 26.50

नेह-मञ्जरी

कुँवर प्रेम कौ सागर राजै। प्रिया-प्रेम तहँ भँवर बिराजै॥५०॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री लाल जी का स्वरूप चौपाई सोरठा श्री लाल जी की प्रीति-रीति चौपाई रसिक कुँवर प्रियतम प्रेम के अपार समुद्र हैं, किन्तु उस प्रेम-समुद्र में पड़ने वाली भँवर का स्वरुप है-श्री प्रिया का प्रेम