ज्यौं सब जल फिरि-फिरि तहाँ परही। ऐसैं लाल प्रिया दिस ढरही॥५१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
जैसे समुद्र का सम्पूर्ण जल बारम्बार यहाँ-वहाँ से घूम कर भँवर में आ गिरता है, वैसे ही प्रेमी श्री लाल जी अपनी प्रेमास्पदा प्रिया की ओर ही निरन्तर ढलते रहते हैं