॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 26.51

नेह-मञ्जरी

ज्यौं सब जल फिरि-फिरि तहाँ परही। ऐसैं लाल प्रिया दिस ढरही॥५१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

जैसे समुद्र का सम्पूर्ण जल बारम्बार यहाँ-वहाँ से घूम कर भँवर में आ गिरता है, वैसे ही प्रेमी श्री लाल जी अपनी प्रेमास्पदा प्रिया की ओर ही निरन्तर ढलते रहते हैं