कोटि काम सुख होत हैं, हँसि चितवत पिय ओर।
भूलि जात तन की दसा, परसे प्रेम-झकोर॥६६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
हे सखि ! प्रियतम कहते हैं कि मेरे लिए वहीं क्षण , वही पल धन्य है जब कुँवरि-किशोरी प्रसन्न दृष्टि से मेरी ओर देखती हैं॥। ६५॥प्रेम के झूले में झूलने वाले प्रियतम को कोटि-कोटि कामनाओं का सुखस्वरूप फल उस समय प्राप्त हुआ प्रतीत होता है , जब प्राण-प्रियतमा किशोरी उनकी ओर मुसकुराती हुईं दृष्टिपात करती हैं और जब वे उस सुखानुभूति में अपना देहानुसन्धान खो बैठते हैं