॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 26.88

नेह-मञ्जरी

प्रेम तृषा की ताप ध्रुव, कैसे हुँ कही न जाइ।
रूप-नीर छिरकत रहैं, तऊ न नैंन अघाँइ॥८८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

दोहा चौपाई श्री ध्रुवदास जी पुनः कहते हैं कि प्रेम प्यास के मधुर ताप अर्थात्‌ प्रेम-ऊष्मा का वर्णन कर सकना असम्भव है । प्रेम-संतप्त नेत्रों पर रूप-जल का सिञ्चन करते रहने पर भी नेत्रों को परितृप्ति नहीं मिलती