प्रेम तृषा की ताप ध्रुव, कैसे हुँ कही न जाइ।
रूप-नीर छिरकत रहैं, तऊ न नैंन अघाँइ॥८८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
दोहा चौपाई श्री ध्रुवदास जी पुनः कहते हैं कि प्रेम प्यास के मधुर ताप अर्थात् प्रेम-ऊष्मा का वर्णन कर सकना असम्भव है । प्रेम-संतप्त नेत्रों पर रूप-जल का सिञ्चन करते रहने पर भी नेत्रों को परितृप्ति नहीं मिलती