॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 4.51

श्री वृन्दावन शत

वृंदावन के वास कौ, जिनकैं नाहिं हुलास।
माता मित्र सुतादि तिय, तजि ध्रुव तिनकौ पास॥५१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि श्री वृन्दावन-वास के लिए जिनके मन में उत्साह नहीं है, वे माता, पिता, पुत्र एवं पत्नी आदि ही क्यों न हों, उनका भी सामीप्य त्याग देना चाहिये