वृंदावन के वास कौ, जिनकैं नाहिं हुलास।
माता मित्र सुतादि तिय, तजि ध्रुव तिनकौ पास॥५१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि श्री वृन्दावन-वास के लिए जिनके मन में उत्साह नहीं है, वे माता, पिता, पुत्र एवं पत्नी आदि ही क्यों न हों, उनका भी सामीप्य त्याग देना चाहिये