समुझि सनेह नैंन भरि आये। मनौ कंज आनँद जल छाये॥११५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
अपने प्रति श्री प्रिया के गम्भीर प्रेम का अनुभव करके प्रियतम के नेत्र छल-छला उठे । उस समय अश्रु-कण बरसते नेत्रों की छबि ऐसी लगी,मानो अरुण कमलों पर आनन्द रूपी जल छा गया हो