नित्त प्रेम एकै रस धारा। अति अगाध तेहि नाहिंन पारा॥१२०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
युगल का यह नित्य प्रेम एक विलक्षण रस की धारा है, जो कभी न्यून नहीं होती। यह रस-धारा अत्यन्त गम्भीर, अथाह एवं अपार है