और देस के बसत ही, अधिक भजन जौ होइ।
इहि सम नहिं पूजत तऊ, वृंदावन रहै सोइ॥५२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
अन्य देशों के निवास में भले ही अधिक भजन होता हो, किन्तु वह भजन वृन्दावन में सोते रहने के बराबर भी नहीं है