मादिक मधुर माधुरी अंगा। दुर्ल्लभता के उठत तरंगा॥१४१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
प्रेम के अङ्ग हैं-मादकता (मस्ती एवं सहज उपरामता) , मधुरता एवं प्रतिक्षण माधुर्य-बोध । प्रेम परम दुर्लभ है अर्थात प्रेम में दुर्लभता की तरङ्गे उठती रहती हैं