॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 26.150

नेह-मञ्जरी

यह विहार जाके उर आवै। ताहि न बात दूसरी भावै॥१५०॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

यह निकुञ्ज-विहार जिसके हृदय में (कृपावशात्‌) प्रकट होता है, उस प्रेमी रसिक को इसके सिवाय अन्य कोई बात सुहाती ही नहीं