यह विहार जाके उर आवै। ताहि न बात दूसरी भावै॥१५०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
यह निकुञ्ज-विहार जिसके हृदय में (कृपावशात्) प्रकट होता है, उस प्रेमी रसिक को इसके सिवाय अन्य कोई बात सुहाती ही नहीं