ब्रह्म जोति को तेज जहाँ, जोगेश्वर धरैं ध्यान।
ताही कौ आवरन तहाँ, नहिं पावै कोउ जान॥१६८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
नव योगेश््वर-गण किंवा अन्यान्य शिवादि योगेश्वर-गण जिसका निरन्तर ध्यान करते रहते हैं , ऐसी किसी अनिर्वचनीय ब्रह्मज्योति का जिस वृन्दावन के चतुर्दिक ज्योतिर्मय आवरण है , वह अवाङ्ग मनसागोचर वृन्दावन धाम अपने निज-स्वरूप में सदा अवस्थित है, जिसके समीप तक जा पहुँचना असम्भव है