॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 26.168

नेह-मञ्जरी

ब्रह्म जोति को तेज जहाँ, जोगेश्वर धरैं ध्यान।
ताही कौ आवरन तहाँ, नहिं पावै कोउ जान॥१६८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

नव योगेश्‍्वर-गण किंवा अन्यान्य शिवादि योगेश्वर-गण जिसका निरन्तर ध्यान करते रहते हैं , ऐसी किसी अनिर्वचनीय ब्रह्मज्योति का जिस वृन्दावन के चतुर्दिक ज्योतिर्मय आवरण है , वह अवाङ्ग मनसागोचर वृन्दावन धाम अपने निज-स्वरूप में सदा अवस्थित है, जिसके समीप तक जा पहुँचना असम्भव है