॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 27.6

वन-विहार

कहा कहौं बानिक बनक, सुंदर परम उदार।
चरननि तर लोटत बिवस, निरखि रूप सिंगार॥६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

आज की बानक और उसका बनाव परम उदार सुन्दर युगल पर कुछ ऐसा शोभित है, जिसका दर्शन करके लगता है कि मूर्त्तिमान रूप एवं शृङ्गार-रस दोनों ही श्री राधावल्लभ लाल के चरण-तल पर विलुण्ठित हो रहे हैं