कहा कहौं बानिक बनक, सुंदर परम उदार।
चरननि तर लोटत बिवस, निरखि रूप सिंगार॥६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
आज की बानक और उसका बनाव परम उदार सुन्दर युगल पर कुछ ऐसा शोभित है, जिसका दर्शन करके लगता है कि मूर्त्तिमान रूप एवं शृङ्गार-रस दोनों ही श्री राधावल्लभ लाल के चरण-तल पर विलुण्ठित हो रहे हैं