साखियनि के उर फूल भई, दूधा-भाती हेत।
ऐसी बैठी मुरि कुँवरि, अंचल छुवन न देत॥३४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
सखियों के मन में जब 'दूधाभाती' कराने की उत्कण्ठा हुई, तो उस समय नवल वधू सिमिट कर ऐसी बैठ गयी कि अपना अञ्चल भी स्पर्श नहीं करने देती