॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 27.44

वन-विहार

बढ़ि गयौ ऐसौ प्रेम-रस, बिदा लाज की कीन।
चितवनि मुसिकनि सहज की, बतियनि माँहि प्रवीन॥४४॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

वर-वधू के इस मिलन में कुछ ऐसे विलक्षण प्रेम का प्रवाह बढ़ा, जिसने लज्जा को विदा कर दिया और तब परम प्रवीण युगल रसिक सहज चितवन, मुसकान एवं बतरस में लीन हो गये