कहाँ तू कहाँ वृंदाविपिन, आनि बन्यौ भल बान।
यहै बात जिय समुझि कै, अपनौं छाँड़ि सयान॥६२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री वृन्दावन का वास जिस-तिस प्रकार से भी दृढ़ हो वैसा ही यत्न करना चाहिये । जीवन में यह अवसर हाथ से नहीं खोना चाहिये । ६१॥हे मानव ! कहाँ तू तुच्छ प्राणी और कहाँ दिव्य वृन्दावन का वास । क्या ही अच्छा सुयोग बना है, इस बात को मन में विचार कर अपनी चतुराई छोड़ दे एवं बृन्दावन-वास कर