सखी एक दई आरसी, ललित लाड़िली पाँनि।
तेहि छिन पिय कौ मन पर्यौ, द्वै छबि के बिच आनि॥२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
उस समय एक सन्निकटवर्ती सखी ने ललित लाड़िली जू के कर-कमलों में स्वच्छ स्फटिक मणि का दर्पण दिया और जब स्वामिनी ने दर्पण को सम्मुख किया तो उसमें उनका स्वच्छ प्रतिबिम्ब झलक उठा । उस समय बिम्ब और प्रतिबिम्ब का दर्शन करके प्रियतम का मन एक ही भाँति की युगल छवि के दर्शन से सम्भ्रम में पड गया