सुरंग चुनरी एक में, रँग-भींने सुकुँवार।
लपटे ऐसी भाँति सौं, नहिं समात बिच हार॥८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
फिर कभी रङ्ग-भीने युगल-किशोर एक ही सुरङ्ग चूनरी में लिपटे हुए ऐसे आलिङ्गित हो जाते हैं कि उनके बीच में एक हार का भी अवकाश नहीं रह जाता