॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

श्री हित बयालीस लीला — छंद 28.8

रङ्ग-विहार

सुरंग चुनरी एक में, रँग-भींने सुकुँवार।
लपटे ऐसी भाँति सौं, नहिं समात बिच हार॥८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

फिर कभी रङ्ग-भीने युगल-किशोर एक ही सुरङ्ग चूनरी में लिपटे हुए ऐसे आलिङ्गित हो जाते हैं कि उनके बीच में एक हार का भी अवकाश नहीं रह जाता