नहिं सो माता पिता नहिं, मित्र पुत्र कोउ नाहिं।
इनमें जो अंतर करै, बसत बूँदावन माँहि॥६५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
कोटि-कोटि हीरा, रत्न और विविध प्रकार की मूल्यवान् मणियों का झूठा लोभ छोड़ कर वृन्दावन रूपी अमूल्य मणि को ग्रहण कर॥।६४॥वह माता, माता नहीं है, पिता, पिता नहीं है, मित्र और पुत्र भी कोई अपने नहीं हैं, जो श्री वृन्दावन-वास करने में अन्तराय उत्पन्न करते हैं