पुनि-पुनि प्यारी प्यार सौं, रँवकि लिये उर लाइ।
देखत मुख हिय दुख भयौ, नैंननिं जल भरे आइ॥४१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
तभी प्राण-प्रिया अत्यन्त प्यार पूर्वक लपक कर प्रियतम को अपने हृदय से लगा लेती हैं और बारम्बार उन्हें आलिङ्गन दान करती हैं । प्रियतम के विरह-व्यथित मुख का अवलोकन करके करुणामयी किशोरी का हृदय दुःख से भर जाता है एवं नेत्र अश्रु-पूरित हो जाते हैं