तापर रसिकनि रसिक दोउ, नागर नवल किसोर।
अवलोकत मुख माधुरी, जैसैं चंद चकोर॥७॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
उन आसनों पर नागर नवल किशोर रसिक युगल विराजित होकर परस्पर एक दूसरे की मुख-माधुरी का चन्द्र-चकोर की भति पान कर रहे हैं