कजरारे उज्ज्वल सुरँग, अनियारे दोउ नैंन।
उपमा और कहा कहौं, मोहन-मन हरि लैन॥७॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
प्रिया के अरुण एवं उज्ज्वल, अनियारे, कजरारे युगल नयन, जो मनहरण मोहन लाल के भी मन का सहज मन हरण कर लेते हैं, निरुपम एवं अवर्णनीय हैं