॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 30.7

रङ्ग-हुलास

कजरारे उज्ज्वल सुरँग, अनियारे दोउ नैंन।
उपमा और कहा कहौं, मोहन-मन हरि लैन॥७॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

प्रिया के अरुण एवं उज्ज्वल, अनियारे, कजरारे युगल नयन, जो मनहरण मोहन लाल के भी मन का सहज मन हरण कर लेते हैं, निरुपम एवं अवर्णनीय हैं