अधरनि की छबि कहा कहौं, रसमय मधुर सुरंग।
सींचत पिय हिय लोचननि, पानिप वारि तरंग॥८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रिया के अरुणिम एवं रसमय मधुर अधर-पल्लवों की छवि कैसे वर्णन की जा सकती है ? वे अपनी लावण्यरूपी जल तरङ्गं से रसिक-प्रियतम के हृदय एवं नेत्रां का सिञ्चन करती रहती है