॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 30.8

रङ्ग-हुलास

अधरनि की छबि कहा कहौं, रसमय मधुर सुरंग।
सींचत पिय हिय लोचननि, पानिप वारि तरंग॥८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रिया के अरुणिम एवं रसमय मधुर अधर-पल्लवों की छवि कैसे वर्णन की जा सकती है ? वे अपनी लावण्यरूपी जल तरङ्गं से रसिक-प्रियतम के हृदय एवं नेत्रां का सिञ्चन करती रहती है