वृंदावन के गुननि सुनि, हित सौं रज में लोटि।
जेहि सुख कौं पूजत नहीं, मुक्ति आदि सत कोटि॥७२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
वृन्दावन के गुणों को सुनो, प्रेमपूर्वक इसकी रज में लोटो, इस सुख की समता शत कोटि मुक्तियाँ भी नहीं कर सकतीं