॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 4.72

श्री वृन्दावन शत

वृंदावन के गुननि सुनि, हित सौं रज में लोटि।
जेहि सुख कौं पूजत नहीं, मुक्ति आदि सत कोटि॥७२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

वृन्दावन के गुणों को सुनो, प्रेमपूर्वक इसकी रज में लोटो, इस सुख की समता शत कोटि मुक्तियाँ भी नहीं कर सकतीं