नवल सखी छवि नई-नई, अंग-अंग झलकंत।
मनु सुहाग अनुराग की, सींव सुरँग सीमंत॥२६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
इस नयी सखी की नयी-नयी शोभा उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग से झलकती हुई यह प्रकट करने लगी कि वह अपनी अरुणिम सीमन्त रेखा के द्वारा अनुराग और सुहाग की चरम एवं परम अवधि है