॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 31.16

रङ्ग-विनोद

कजरारे चंचल नयन, छबि की उठत झकोर।
को समुझै घन मेघ सुख, बिना रसिक वर मोर॥१६॥