॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 32.1

आनन्द-दशा विनोद

प्रथमहिं श्रीगुरु कृपा तें, नित्य-विहार सुरंग।
बरनों कछु इक जथामति, दंपति-केलि अनंग॥१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

प्रस्तावना दोहा नायक-नायिका श्रृङ्गार भेद से विलक्षण वृन्दावनीय-उज्ज्वल रस दोहा श्री ध्रुददास जी कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम श्री गुरुदेव की कृपा प्राप्त करके अपनी बुद्धि के अनुसार श्री श्यामा-श्याम दम्पति की प्रेम-केलि (आनन्दमय नित्य-विहार) का यत्किञ्चित्‌ वर्णन करने का प्रयास करूंगा