॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 32.8

आनन्द-दशा विनोद

प्रेम-सिंधु उमड़े रहैं, कबहूँ घटत जु नाँहिं।
तेहि सुख कौ सुख कहा कहौं, जो उपजत दुँहु माँहिं॥८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री वृन्दावन नित्य-विहार देश में प्रेम के दो समुद्र सदैव उफने रहते हैं , जो कभी उद्वेलन उज्ज्वल रस में नवोढ़ा का स्वरूप दोहा रहित नहीं होते । उन दोनों समुद्रों के उमड़न एवं मिलन में जिस अभूतपूर्व सुख की सृष्टि होती है, द्रष्टा के उस सुख का वर्णन असम्भव है