॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

श्री हित बयालीस लीला — छंद 32.43

आनन्द-दशा विनोद

भीने दोउ आसक्ति रस, तन-मन रहे अरुझाइ।
एक प्यार ही दुहुँनि पर, रह्यौ सहज ही छाइ॥४३॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

कवित्त ऐसे प्रेम के शुद्ध स्वरूप युगल आसक्ति के रस में सराबोर हुए परस्पर में तन-मन से उलझे हुए हैं। दोनों पर केवल प्रेम-प्यार ही सहज रूप से छाया रहता है। प्रेम के अतिरिक्त यहाँ और कुछ है ही नहीं