भीने दोउ आसक्ति रस, तन-मन रहे अरुझाइ।
एक प्यार ही दुहुँनि पर, रह्यौ सहज ही छाइ॥४३॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
कवित्त ऐसे प्रेम के शुद्ध स्वरूप युगल आसक्ति के रस में सराबोर हुए परस्पर में तन-मन से उलझे हुए हैं। दोनों पर केवल प्रेम-प्यार ही सहज रूप से छाया रहता है। प्रेम के अतिरिक्त यहाँ और कुछ है ही नहीं