और न कछू सुहाइ मन, यह जाँचत निसि-भोर।
या सुख-धन सौं लगे रहौ, “ध्रुव' लोइनि दिन मोर॥५५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मेरे मन. के लिए रसिक युगल के रस-विलास के अतिरिक्त अन्य कुछ भी रुचिकर नहीं है। मेरी अहर्निश एक ही याचना है कि मेरे नेत्र इसी सुख रूपी धन के लोभ से सदा संलग्न रहे आवें