॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 32.55

आनन्द-दशा विनोद

और न कछू सुहाइ मन, यह जाँचत निसि-भोर।
या सुख-धन सौं लगे रहौ, “ध्रुव' लोइनि दिन मोर॥५५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मेरे मन. के लिए रसिक युगल के रस-विलास के अतिरिक्त अन्य कुछ भी रुचिकर नहीं है। मेरी अहर्निश एक ही याचना है कि मेरे नेत्र इसी सुख रूपी धन के लोभ से सदा संलग्न रहे आवें