॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 33.26

रहस्य-लता

अति उदार सुकुँवार दोउ, रसिक सूर रस माँहिं।
छिन-छिन बाढ़त चौंप नई, नैंकु मुरत मन नाँहिं॥२६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

रस रूपी रणाङ्गण में युगल रसिक सूर अतिशय उदार एवं सुकुमार हैं, तथापि प्रतिक्षण नव-नव उल्लास की वृद्धि के कारण उनका मन सुरत-समर से किञ्चित्‌ भी पीछे नहीं हटता