॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 33.58

रहस्य-लता

वृंदावन वर कल्पतरु, सर्वोपरि 'ध्रुव आहि।
मनहूँ कै जो चिंतवत, देत तबहिं फल ताहि॥५८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

सन्त श्री ध्रुवदासजी कहते हैं कि श्री वृन्दावन धाम सर्वोपरि श्रेष्ठतम कल्पतरू है, जो मन से भी चिन्तन-स्मरण करने वाले को तत्काल वाञ्छित्‌ फल प्रदान करता है