वृंदावन वर कल्पतरु, सर्वोपरि 'ध्रुव आहि।
मनहूँ कै जो चिंतवत, देत तबहिं फल ताहि॥५८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
सन्त श्री ध्रुवदासजी कहते हैं कि श्री वृन्दावन धाम सर्वोपरि श्रेष्ठतम कल्पतरू है, जो मन से भी चिन्तन-स्मरण करने वाले को तत्काल वाञ्छित् फल प्रदान करता है