दोहा रहसि लतानि के, अष्ट उपरि पंचास।
सुनत सुनावत बढ़त उर, 'हित ध्रुव' प्रेम-विलास॥५९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
अस्तु, वे अब ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए पुनः कहते हैं कि 'रहस्य-लता' नामक ग्रन्थ के अट्ठावन दोहे हैं, जिन्हें सुनने और सुनाने से निश्चित ही श्रोता-वक्ता के हृदय में युगल-प्रेम-विलास के प्रति हित की स्थापना होती है