॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 33.59

रहस्य-लता

दोहा रहसि लतानि के, अष्ट उपरि पंचास।
सुनत सुनावत बढ़त उर, 'हित ध्रुव' प्रेम-विलास॥५९॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

अस्तु, वे अब ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए पुनः कहते हैं कि 'रहस्य-लता' नामक ग्रन्थ के अट्ठावन दोहे हैं, जिन्हें सुनने और सुनाने से निश्चित ही श्रोता-वक्ता के हृदय में युगल-प्रेम-विलास के प्रति हित की स्थापना होती है