॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 34.12

आनन्द-लता

उरज कलस कुंदन बने, मानौं मंगल साज।
कुँवरि रूप के नगर कौ, पिय पायौ सुख-राज॥१२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

[श्रीलाल जी के कर-कमलों द्वारा प्रिया के उरोजों के आच्छादन का पुनः एक रूपक प्रस्तुत करते हुए श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि] नवल-किशोरी के कञ्चन-कलश रूपी उरोजों पर श्रीलाल का कराच्छादन ही “आनन्द मङ्गल की साज-सज्जा है, जिसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो नवल-किशोरी प्रिया का रूप 'आनन्द' रूपी नगर है, जिसका सुखमय राज्याधिकार प्रियतम श्रीलाल जी ने प्राप्त कर लिया है