नैंन श्रमित मुद्रित मनौं, प्रीतम रहे छबि जोहि।
मानौं कंचन माल में, छबि के अलि रहे सोहि॥२५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
रस से अलसायी हुई प्रिया के थकित एवं मुँदे हुए नेत्रों की छवि ऐसी लगती है, मानो स्वर्ण के कमल में शोभा रूपी भ्रमर विश्राम करते शोभित हों