जहँ लगि स्वाद कहे जग माँहीं। सहजहि ते फीके ह्वै जाँहीं॥१९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
मेरी जिद्दा संसार के समस्त स्वादिष्ट पदार्थो में सहज ही स्वादहीनता का अनुभव करेगी अर्थात् सुस्वाद पदार्थ भी मुझे नीरस प्रतीत होने लगेंगे