॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 35.19

अनुराग-लता

जहँ लगि स्वाद कहे जग माँहीं। सहजहि ते फीके ह्वै जाँहीं॥१९॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

मेरी जिद्दा संसार के समस्त स्वादिष्ट पदार्थो में सहज ही स्वादहीनता का अनुभव करेगी अर्थात्‌ सुस्वाद पदार्थ भी मुझे नीरस प्रतीत होने लगेंगे