॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 35.53

अनुराग-लता

तिनकौं प्रभुता देखि भुलानी। चितवत दूरि भई बिलखानी॥५३॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

दोहा प्रेम का अधिकारी चौपाई प्रियतम के इस सेवामय स्वरूप का अवलोकन करके साक्षात्‌ प्रभुता भी आत्म-विस्मृत हो रहती है एवं विलखती हुई दूर जा खड़ी श्याम-सुन्दर के सेवा-परायण प्रेम रूप का अवलोकन करती रह जाती है